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नोएडा ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट: नियम उल्लंघन और फंड डायवर्जन की जांच में जुटी सीबीआई

नोएडा: उत्तर प्रदेश में नोएडा के सेक्टर-118 में आईवीआर बिल्डर को आवंटित जमीन से जुड़े मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) ने बुधवार को नोएडा अथॉरिटी के अधिकारियों से पांच घंटे तक पूछताछ की।

इस दौरान ग्रुप हाउसिंग और लैंड डिपार्टमेंट के तीन अधिकारियों को दिल्ली स्थित सीबीआई कार्यालय में बुलाया गया। एजेंसी ने आईवीआर को आवंटित जमीन से जुड़े दस्तावेज, फाइलों पर हुए हस्ताक्षर और आवंटन प्रक्रिया से संबंधित कई बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी ली।

सेक्टर-118 की जमीन और डेवलपमेंट एग्रीमेंट

सेक्टर-118 स्थित ग्रुप हाउसिंग परियोजना की जमीन वर्ष 2010-11 में आईवीआर बिल्डर को आवंटित की गई थी। 2012 में आईवीआर ने इस जमीन के विकास के लिए दो बड़े बिल्डर सुपरटेक और अजनारा के साथ एग्रीमेंट किया। इस एग्रीमेंट के तहत दोनों बिल्डर कंपनियों को प्रोजेक्ट विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। बाद में इस जमीन पर आवासीय परियोजना विकसित करने की योजना आगे बढ़ाई गई।

नियमों का उल्लंघन और फंड का इस्तेमाल

सूत्रों के अनुसार, सीबीआई यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि जमीन आवंटन और डेवलपमेंट एग्रीमेंट की प्रक्रिया में कहां नियमों का उल्लंघन हुआ और प्रोजेक्ट के फंड का इस्तेमाल कैसे किया गया। एजेंसी यह भी देख रही है कि जमीन आवंटन के समय क्या शर्तें तय की गई थीं और क्या बाद में आईवीआर ने किसी अन्य डेवलपर को प्रोजेक्ट देने की अनुमति ली थी या बिल्डर ने अपने मन से फैसला किया।

संभावित अनियमितताओं और सबवेंशन स्कीम की जांच

जांच में शामिल पहलुओं में जमीन आवंटन प्रक्रिया में संभावित अनियमितताएं, प्रोजेक्ट के डेवलपमेंट एग्रीमेंट में नियमों का उल्लंघन, वित्तीय लेन-देन और फंड डायवर्जन और सबवेंशन स्कीम में बायर्स को धोखा और लोन का गलत इस्तेमाल है। सीबीआई यह भी देख रही है कि कहीं बिल्डर कंपनियों और संबंधित पक्षों के बीच मिलीभगत तो नहीं हुई।

अथॉरिटी अधिकारियों से पूछताछ

अधिकारियों से उस समय की फाइल नोटिंग, निर्णय लेने की प्रक्रिया और आवंटन से जुड़े अनुमोदनों के बारे में विस्तार से जानकारी ली गई। साथ ही यह भी पूछा गया कि आईवीआर द्वारा प्रोजेक्ट को अन्य बिल्डर कंपनियों को विकसित करने की अनुमति प्राधिकरण से ली गई थी या नहीं।

लोन की किस्तों और बायर्स पर असर

जिस लोन की किस्त बिल्डरों के माध्यम से बैंकों को चुकाई जानी थी, उसे बाद में बिल्डरों ने कुछ समय बाद देना बंद कर दिया। इसके बाद बैंकों ने सीधे बायर्स से किस्त लेना शुरू कर दिया।

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